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नवग्रहों की खोज और उनका ऐतिहासिक महत्व: ब्रह्मांड के 9 स्तंभ

नवग्रहों की खोज कब और कैसे हुई? जानें सूर्य, चंद्र से लेकर राहु-केतु तक का संपूर्ण इतिहास। भारतीय खगोल विज्ञान, वैदिक ऋषियों की गणना और नवग्रहों के वैज्ञानिक महत्व पर विस्तृत लेख।
8 February 2026 by
patel Shivam

नवग्रहों की खोज और उनका ऐतिहासिक महत्व: ब्रह्मांड के 9 स्तंभ | Skill Astro

अनादि काल से, जब मानव ने पहली बार रात्रि के आकाश की ओर देखा, तो टिमटिमाते तारों के बीच कुछ ऐसे विशेष पिंड थे जो अपनी जगह बदल रहे थे। ये स्थिर नहीं थे, बल्कि एक निश्चित पथ पर यात्रा कर रहे थे। भारतीय ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि और गणितीय गणनाओं से इन्हें पहचाना और इन्हें नाम दिया—'ग्रह'

'नवग्रह' (नौ ग्रह) भारतीय ज्योतिष और खगोल विज्ञान की आधारशिला हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना किसी आधुनिक दूरबीन (Telescope) के हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले इनका पता कैसे लगाया? उन्होंने शनि की मंद गति और राहु-केतु जैसे अदृश्य छाया ग्रहों (Shadow Planets) को कैसे खोजा?

आज के इस विस्तृत लेख में हम नवग्रहों की खोज की रोमांचक यात्रा पर चलेंगे और उनके ऐतिहासिक, धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व को समझेंगे।

भाग 1: 'ग्रह' शब्द का अर्थ और परिभाषा

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारतीय ज्योतिष में 'ग्रह' का अर्थ आधुनिक विज्ञान के 'प्लैनेट' (Planet) से भिन्न है।

  • व्युत्पत्ति: संस्कृत धातु 'ग्रह' से बना है, जिसका अर्थ है— 'ग्रहण करना' या 'पकड़ना' (To Seize/Grasp)।

  • परिभाषा: वे आकाशीय पिंड या बिंदु जो पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों की चेतना और कर्मों को प्रभावित करते हैं (या जकड़ते हैं), उन्हें ग्रह कहा जाता है।

यही कारण है कि सूर्य (जो एक तारा है) और चंद्रमा (जो एक उपग्रह है) को भी भारतीय ज्योतिष में 'ग्रह' की श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि इनका पृथ्वी पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है।

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भाग 2: नवग्रहों की खोज का इतिहास – वैदिक काल से सिद्धांत काल तक

नवग्रहों की खोज एक दिन में नहीं हुई। यह सदियों के अवलोकन और गणितीय तपस्या का परिणाम है।

1. वैदिक काल: प्रत्यक्ष दर्शन

ऋग्वेद और अथर्ववेद में सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उस समय ऋषि खुले आकाश के नीचे रहते थे और प्रकृति ही उनकी प्रयोगशाला थी।

  • सूर्य और चंद्र: ये सबसे चमकीले थे, इसलिए सबसे पहले इन्हें पहचाना गया। सूर्य को 'आत्मा' और चंद्रमा को 'मन' का कारक माना गया।

  • बृहस्पति (Guru): ऋग्वेद में बृहस्पति का उल्लेख देवताओं के पुरोहित के रूप में मिलता है। इसे आकाश में एक अत्यंत चमकीले तारे के रूप में पहचाना गया था।

2. महाकाव्य काल: ग्रहों का मानवीकरण

रामायण और महाभारत काल तक आते-आते, ग्रहों को केवल आकाशीय पिंड नहीं, बल्कि देवताओं के रूप में देखा जाने लगा।

  • महाभारत के युद्ध के समय 'शनि' और 'मंगल' की युति (Conjunction) का वर्णन मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि उस समय तक इन ग्रहों की गति का सूक्ष्म ज्ञान हो चुका था।

3. सिद्धांत काल: गणितीय प्रमाण

ईसा की पांचवीं शताब्दी के आसपास, जब आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे महान खगोलशास्त्री आए, तब नवग्रहों की स्थिति की सटीक गणना की गई।

  • आर्यभट्ट का योगदान: उन्होंने अपनी पुस्तक 'आर्यभटीय' में स्पष्ट किया कि ग्रह सूर्य का प्रकाश परावर्तित (Reflect) करके चमकते हैं, उनका अपना प्रकाश नहीं होता (सूर्य को छोड़कर)।

  • वराहमिहिर की दृष्टि: उन्होंने 'पंचसिद्धांतिका' में ग्रहों की कक्षाओं (Orbits) और उनके व्यास की गणना की। उन्होंने ही राहु और केतु के ग्रहण सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप दिया।

भाग 3: नवग्रहों का विस्तृत परिचय और उनकी खोज की कहानी

आइए अब एक-एक करके नौ ग्रहों की खोज और उनके महत्व को गहराई से समझें।

1. सूर्य (The Sun) – ग्रहों का राजा
  • खोज: सूर्य प्रत्यक्ष है, इसलिए इसकी खोज का प्रश्न ही नहीं उठता। परंतु, यह स्थिर है या पृथ्वी इसके चक्कर लगाती है—इस पर भारतीय मत अलग-अलग समय पर भिन्न रहे। अंततः, ज्योतिष में 'भू-केंद्रित' (Geocentric) प्रणाली अपनाई गई क्योंकि हम पृथ्वी से आकाश को देखते हैं।

  • महत्व: इसे 'काल-पुरुष की आत्मा' कहा गया है। स्वास्थ्य, पिता, राज्य और शक्ति का कारक सूर्य है।

2. चंद्रमा (The Moon) – ग्रहों की रानी
  • खोज: रात्रि का स्वामी। इसकी कलाओं (तिथियों) के आधार पर ही भारतीय पंचांग और महीनों का निर्माण हुआ।

  • महत्व: चंद्रमा मन का कारक है। समुद्र में ज्वार-भाटा चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से आता है, और मानव शरीर में भी 70% जल है, इसलिए यह हमारी भावनाओं को नियंत्रित करता है।

3. मंगल (Mars) – सेनापति
  • खोज: प्राचीन खगोलविदों ने देखा कि एक लाल रंग का तारा आकाश में अजीब तरीके से चलता है (Vakra Gati या वक्री गति)। इसका रंग रक्त जैसा था, इसलिए इसे युद्ध का देवता या 'मंगल' कहा गया।

  • महत्व: यह ऊर्जा, साहस, रक्त और भूमि का कारक है।

4. बुध (Mercury) – राजकुमार
  • खोज: बुध सूर्य के सबसे निकट है, इसलिए इसे देखना बहुत कठिन था। यह केवल सूर्योदय से ठीक पहले या सूर्यास्त के ठीक बाद दिखाई देता है। इसे खोजने के लिए अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता थी।

  • महत्व: यह बुद्धि, वाणी, व्यापार और गणित का कारक है।

5. बृहस्पति (Jupiter) – गुरु
  • खोज: यह आकाश में बहुत स्थिर और भव्य दिखाई देता है। इसका पीलापन और विशालता इसे अन्य तारों से अलग करती है। भारतीय ऋषियों ने इसे 'गुरु' (भारी) नाम दिया, क्योंकि यह सौरमंडल का सबसे भारी ग्रह है।

  • महत्व: ज्ञान, संतान, धन और धर्म का कारक।

6. शुक्र (Venus) – मंत्री
  • खोज: यह आकाश का सबसे चमकीला ग्रह है। इसे 'भोर का तारा' (Morning Star) भी कहा जाता है। ऋषि भृगु के वंशज होने के कारण इसे भार्गव भी कहा गया।

  • महत्व: सौंदर्य, कला, विवाह और भौतिक सुखों का कारक।

7. शनि (Saturn) – सेवक/न्यायाधीश
  • खोज: शनि नंगी आंखों से दिखाई देने वाला अंतिम ग्रह है। इसकी खोज सबसे रोचक थी क्योंकि यह बहुत धीरे चलता है। यह एक राशि को पार करने में ढाई वर्ष लेता है। संस्कृत में 'शनैः' का अर्थ है 'धीरे'। इसी से इसका नाम 'शनैश्चर' (धीरे चलने वाला) पड़ा।

  • महत्व: कर्म, न्याय, दुख, आयु और सेवा का कारक।

8. राहु और केतु (The Shadow Planets) – सबसे बड़ी खोज

यह भारतीय खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। दुनिया जब केवल भौतिक पिंडों को देख रही थी, भारतीय ऋषियों ने 'गणितीय बिंदुओं' (Mathematical Points) को खोज लिया था।

  • खोज का रहस्य: ऋषियों ने देखा कि पूर्णिमा और अमावस्या को हमेशा ग्रहण नहीं लगता। ग्रहण तभी लगता है जब सूर्य और चंद्रमा एक विशेष बिंदु पर काटते हैं। इन कटान बिंदुओं (Nodes) को ही उत्तरी ध्रुव (राहु) और दक्षिणी ध्रुव (केतु) नाम दिया गया।

  • पौराणिक कथा: समुद्र मंथन की कथा में स्वरभानु नामक राक्षस का सिर कटना (राहु) और धड़ (केतु) बनना—इसी खगोलीय घटना का प्रतीकात्मक वर्णन है।

  • महत्व: ये आकस्मिक घटनाओं, भ्रम, शोध और मोक्ष के कारक हैं।

भाग 4: वार (Days of the Week) और नवग्रहों का संबंध

क्या आपने कभी सोचा है कि सप्ताह में 7 ही दिन क्यों होते हैं और उनका क्रम (सोम, मंगल, बुध...) ऐसा ही क्यों है? यह पूरी तरह से नवग्रहों की खोज और उनकी 'होरा' (घंटे) पर आधारित है।

भारतीय ज्योतिष में ग्रहों के क्रम को उनकी गति और पृथ्वी से दूरी के आधार पर व्यवस्थित किया गया, जिससे 'होरा शास्त्र' का जन्म हुआ।

  1. रविवार (सूर्य)

  2. सोमवार (चंद्रमा)

  3. मंगलवार (मंगल) ...और इसी तरह। यह प्रणाली बाद में अरबों और यूनानियों के माध्यम से पूरी दुनिया में फैली। आज पूरी दुनिया जिस कैलेंडर का उपयोग करती है, उसका मूल भारतीय ज्योतिष ही है।

भाग 5: नवग्रह और भारतीय संस्कृति

नवग्रहों का महत्व केवल ज्योतिष तक सीमित नहीं है, यह हमारी वास्तुकला और दैनिक जीवन में रचा-बसा है।

  • मंदिर वास्तुकला: भारत के लगभग हर बड़े मंदिर (विशेषकर दक्षिण भारत) में गर्भगृह के बाहर 'नवग्रह मंडल' स्थापित होता है। कोणार्क का सूर्य मंदिर और कुंभकोणम के नवग्रह मंदिर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

  • रत्न विज्ञान: प्रत्येक ग्रह के लिए एक विशेष रत्न (जैसे सूर्य के लिए माणिक्य, शनि के लिए नीलम) निर्धारित किया गया है, जो रंग चिकित्सा (Color Therapy) पर आधारित है।

भाग 6: क्या नवग्रह विज्ञान है या अंधविश्वास?

यह प्रश्न आधुनिक युग में अक्सर पूछा जाता है।

  • गुरुत्वाकर्षण और ज्वार: विज्ञान मानता है कि चंद्रमा समुद्र को खींचता है। ज्योतिष का तर्क है कि मानव मस्तिष्क भी 'तरल' और विद्युत तरंगों (Neurons) से बना है, तो ग्रह उसे भी प्रभावित करते हैं।

  • सांख्यिकी (Statistics): ज्योतिष हजारों वर्षों के डेटा का संग्रह है। जब ऋषियों ने देखा कि मंगल की विशेष स्थिति में जन्म लेने वाला व्यक्ति क्रोधी होता है, और ऐसा हजारों बार हुआ, तो उन्होंने इसे एक नियम बना दिया।

इसलिए, नवग्रहों का प्रभाव 'अंधविश्वास' नहीं, बल्कि एक ऐसा विज्ञान है जिसे आधुनिक उपकरण अभी पूरी तरह नहीं माप पाए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: नवग्रहों में पृथ्वी को क्यों शामिल नहीं किया गया? 

उत्तर: ज्योतिष 'भू-केंद्रित' (Geocentric) है, जिसका अर्थ है कि हम पृथ्वी पर खड़े होकर ब्रह्मांड को देख रहे हैं। चूंकि हम पृथ्वी पर ही हैं, इसलिए हमारी कुंडली में पृथ्वी की स्थिति नहीं, बल्कि पृथ्वी के सापेक्ष अन्य ग्रहों की स्थिति का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2: राहु और केतु को ग्रह क्यों माना जाता है जबकि वे दिखाई नहीं देते?

 उत्तर: भारतीय ज्योतिष में 'ग्रह' का अर्थ 'पिंड' नहीं, बल्कि 'प्रभाव डालने वाली शक्ति' है। राहु और केतु वे बिंदु हैं जहाँ सूर्य और चंद्र का मार्ग कटता है और ग्रहण होता है। इनका प्रभाव सूर्य और चंद्र के प्रकाश को रोकने (ग्रहण) का होता है, इसलिए इन्हें 'छाया ग्रह' माना जाता है।

प्रश्न 3: नवग्रहों की पूजा क्यों की जाती है?

 उत्तर: यह प्रतीकात्मक है। ग्रहों की पूजा का अर्थ है उन ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के साथ सामंजस्य बिठाना। उदाहरण के लिए, शनि की पूजा का अर्थ है—जीवन में अनुशासन और न्याय को अपनाना।

प्रश्न 4: शनि ग्रह की खोज किसने की थी?

 उत्तर: किसी एक व्यक्ति का नाम लेना कठिन है, लेकिन वैदिक ऋषियों ने इसे हजारों साल पहले पहचान लिया था। उन्होंने इसकी मंद गति के कारण ही इसे 'शनैश्चर' नाम दिया था।

प्रश्न 5: क्या प्लूटो, नेपच्यून और यूरेनस नवग्रहों में शामिल हैं? 

उत्तर: नहीं। पारंपरिक वैदिक ज्योतिष में केवल उन्हीं ग्रहों को लिया गया है जो नंगी आंखों से दिखाई देते हैं (शनि तक)। प्लूटो, नेपच्यून और यूरेनस (अरुण, वरुण, यम) की खोज आधुनिक दूरबीनों से हुई है और इनका प्रभाव बहुत सूक्ष्म और दीर्घकालिक होता है, इसलिए इन्हें पारंपरिक नवग्रहों में नहीं गिना जाता, हालाँकि आधुनिक ज्योतिषी अब इनका अध्ययन भी करते हैं।

निष्कर्ष 

नवग्रहों की खोज मानव इतिहास की बौद्धिक पराकाष्ठा थी। हमारे पूर्वजों ने बिना उपग्रहों और सुपरकंप्यूटरों के ब्रह्मांड की जो तस्वीर खींची, वह आज भी सटीक है। राहु और केतु की खोज तो आधुनिक खगोल विज्ञान के लिए भी एक चमत्कार से कम नहीं है।

यह इतिहास हमें सिखाता है कि हम ब्रह्मांड से अलग नहीं हैं। हम उसी 'तारों की धूल' (Stardust) से बने हैं और उन्हीं ग्रहों की ऊर्जा से संचालित हैं। नवग्रह हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमारे जीवन को दिशा देने और कर्मों को सुधारने के लिए खोजे गए थे।

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patel Shivam 8 February 2026
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