
भारतीय संस्कृति में काल (समय) की गणना और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की जिज्ञासा सदैव प्रबल रही है। जब विश्व की अन्य सभ्यताएं अभी विकास के प्रारंभिक चरण में थीं, तब भारत के ऋषि-मुनि आकाशगंगा, नक्षत्रों और ग्रहों की गति का सूक्ष्म अध्ययन कर रहे थे। इसी अध्ययन ने 'ज्योतिष शास्त्र' को जन्म दिया।
ज्योतिष केवल भविष्य जानने की विद्या नहीं है, अपितु यह मानव का ब्रह्मांड के साथ संवाद है। "यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे" (जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है) – इस सूत्र पर आधारित ज्योतिष शास्त्र की यात्रा अत्यंत रोचक और रहस्यमय रही है। आज के इस विस्तृत लेख में, हम ज्योतिष का विकास क्रम और इसके 5000 वर्षों के इतिहास की परतों को खोलेंगे।
भाग 1: वैदिक काल – ज्योतिष का उद्भव (ईसा पूर्व 5000 - 1500)
ज्योतिष के विकास की पहली किरण हमें वेदों में दिखाई देती है। इसे 'अपौरुषेय' (मानव द्वारा न रचा गया) माना जाता है।
1. वेदों का नेत्र
वेदों को समझने के लिए छह अंगों (वेदांग) की रचना हुई, जिसमें ज्योतिष को "वेदस्य चक्षुः" अर्थात 'वेदों का नेत्र' कहा गया। बिना आँखों के जैसे मार्ग नहीं देखा जा सकता, वैसे ही बिना ज्योतिष के सही समय (काल) का ज्ञान संभव नहीं था।
2. यज्ञ और काल गणना
प्रारंभिक वैदिक काल में ज्योतिष का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत भविष्य बताना नहीं था। उस समय इसका उद्देश्य था— यज्ञ और अनुष्ठानों के लिए शुभ समय का निर्धारण करना। ऋग्वेद और यजुर्वेद में नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है। ऋषियों ने आकाश को 360 अंशों में न बांटकर, चंद्रमा की गति के आधार पर 27 नक्षत्रों में विभाजित किया था। यह भारतीय ज्योतिष की सबसे मौलिक और प्राचीन खोज थी।
नक्षत्र विद्या: उस समय 'राशि' (मेष, वृष आदि) का चलन नहीं था। सब कुछ नक्षत्रों (अश्विनी, भरणी आदि) पर आधारित था।
ऋतु विज्ञान: सूर्य की स्थिति से ऋतुओं के आगमन और वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता था, जो कृषि प्रधान समाज के लिए अनिवार्य था।
भाग 2: वेदांग ज्योतिष काल – प्रथम व्यवस्थित रूप (ईसा पूर्व 1400)
जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हुई, गणनाओं को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी काल में ज्योतिष को एक शास्त्र का रूप मिला।
लगध मुनि का योगदान
लगध मुनि द्वारा रचित 'वेदांग ज्योतिष' इस विषय पर उपलब्ध सबसे प्राचीन ग्रंथ है। यह ग्रंथ मुख्यतः खगोल विज्ञान (गणित) पर केंद्रित था। इसमें बताया गया कि:
सूर्य और चंद्रमा की गति के नियम क्या हैं।
अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन) की गणना कैसे की जाए।
दिन और रात के मान में परिवर्तन क्यों होता है।
इस काल तक ज्योतिष पूरी तरह से 'गणित' और 'पंचांग' निर्माण तक सीमित था। इसमें फलित (भविष्यवाणी) का अंश बहुत कम था।
भाग 3: महाकाव्य और पौराणिक काल – शकुन और भविष्य (ईसा पूर्व 1000 - 600)
रामायण और महाभारत के काल तक आते-आते, ज्योतिष का स्वरूप बदलने लगा। अब यह केवल यज्ञ के समय तक सीमित न रहकर, राजाओं और राज्यों के भाग्य निर्धारण का साधन बनने लगा।
1. ग्रहों का मानवीय जीवन पर प्रभाव
महाभारत में अनेक स्थानों पर ग्रहों की स्थिति का वर्णन है। भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी, जो यह सिद्ध करता है कि उस समय काल का महत्व कितना अधिक था।
2. शकुन शास्त्र का उदय
इस काल में ग्रहों की युति (संयोग), ग्रहण और धूमकेतु को राजाओं के लिए अमंगलकारी माना जाने लगा। महाभारत युद्ध के समय 'तेरह दिनों के पक्ष' (एक पखवाड़े में दो ग्रहण) का वर्णन मिलता है, जिसे विनाशकारी माना गया था। यहीं से 'मेदिनी ज्योतिष' (देश और समाज का भविष्य) की नींव पड़ी।
भाग 4: सिद्धांत काल – ज्योतिष का स्वर्ण युग (ईसा की 5वीं - 12वीं शताब्दी)
यह भारतीय ज्योतिष के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दौर था। इसे 'स्वर्ण युग' कहा जाता है क्योंकि इसी समय गणित, खगोल और फलित का अद्भुत संगम हुआ। इस काल में 18 महान प्रवर्तक हुए, जिनमें सूर्य, पितामह, व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, पराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मरीचि, मनु, अंगिरा, लोमश, पौलिश, च्यवन, यवन, भृगु और शौनक प्रमुख हैं।
1. आर्यभट्ट और गोल विज्ञान
महान गणितज्ञ आर्यभट्ट (476 ईसवी) ने 'आर्यभटीय' ग्रंथ की रचना की। उन्होंने सिद्ध किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और ग्रहण राहु-केतु नामक राक्षसों के कारण नहीं, बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की छाया के कारण होते हैं। उनकी गणनाओं ने कुंडली निर्माण को सटीक बनाया।
2. वराहमिहिर का वर्गीकरण
उज्जैन के विद्वान वराहमिहिर ने ज्योतिष को तीन स्कंधों (स्तंभों) में विभाजित कर इसे पूर्णता प्रदान की:
तंत्र (गणित): ग्रहों की गति और खगोलीय गणना।
होरा (फलित): व्यक्ति की जन्म कुंडली और भविष्य।
संहिता: शकुन, वास्तु, वर्षा और सामुद्रिक शास्त्र।
उनकी रचना 'बृहत संहिता' आज भी ज्योतिष का विश्वकोश मानी जाती है।
3. राशि चक्र का आगमन
इसी काल में 12 राशियों (मेष से मीन) का स्पष्ट रूप से भारतीय ज्योतिष में समावेश हुआ। यद्यपि इसका कुछ प्रभाव यूनानी (यवन) ज्योतिष से माना जाता है, परंतु भारतीय ऋषियों ने इसे 'कर्म सिद्धांत' और 'पुनर्जन्म' के साथ जोड़कर इसे पूरी तरह भारतीय बना दिया।
4. महर्षि पराशर और होरा शास्त्र
महर्षि पराशर द्वारा रचित 'बृहत पराशर होरा शास्त्र' को कलयुग में ज्योतिष का आधार माना जाता है। उन्होंने 'विंशोत्तरी दशा' (ग्रहों की समयावधि) की पद्धति दी, जो विश्व की किसी अन्य ज्योतिष पद्धति में नहीं मिलती। यह पद्धति बताती है कि जीवन के किस वर्ष में कौन सा ग्रह अपना फल देगा।
भाग 5: मध्यकाल – ताजिक और संक्रमण काल (12वीं - 17वीं शताब्दी)
मध्यकाल में भारत पर बाहरी आक्रमण हुए, जिससे संस्कृतियों का आदान-प्रदान हुआ। ज्योतिष भी इससे अछूता नहीं रहा।
ताजिक शास्त्र: अरब और फारस के ज्योतिषियों के संपर्क से 'ताजिक शास्त्र' का विकास हुआ। इसमें 'वर्ष कुंडली' (Varshphal) बनाने की विधि प्रमुख थी, जो आज भी प्रचलित है।
प्रश्न मार्ग: दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में ज्योतिष की एक नई शाखा 'प्रश्न मार्ग' विकसित हुई। इसमें बिना कुंडली के केवल प्रश्न पूछने के समय के आधार पर उत्तर दिया जाता था।
मुगल दरबारों में भी ज्योतिषियों को सम्मान प्राप्त था और उन्होंने कई संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया।
भाग 6: आधुनिक काल – विज्ञान और तकनीक का संगम
अंग्रेजों के आगमन और आधुनिक शिक्षा के प्रसार ने ज्योतिष को एक नई चुनौती और दिशा दी।
1. मुद्रण कला (Printing) का प्रभाव
पहले ज्ञान ताड़पत्रों और गुरु-शिष्य परंपरा तक सीमित था। प्रिंटिंग प्रेस के आने से पंचांग और ज्योतिष के ग्रंथ आम जनता तक पहुंचे। वाराणसी और उज्जैन से प्रकाशित होने वाले पंचांग घर-घर का हिस्सा बन गए।
2. कृष्णमूर्ति पद्धति (K.P. Astrology)
20वीं सदी में दक्षिण भारत के विद्वान के.एस. कृष्णमूर्ति ने देखा कि पारंपरिक विधियों में कभी-कभी सटीकता की कमी रह जाती है। उन्होंने नक्षत्रों को और सूक्ष्म भागों (उप-नक्षत्र या Sub-lord) में बांटा। इसे 'के.पी. पद्धति' कहा जाता है, जो अपनी सटीक भविष्यवाणियों के लिए प्रसिद्ध है।
3. संगणक (कम्प्यूटर) क्रांति
1980 के दशक के बाद कम्प्यूटर के आगमन ने ज्योतिष की कायापलट कर दी।
जो गणनाएं करने में घंटों लगते थे और जिनमें त्रुटि की संभावना होती थी, वे अब क्षण भर में उपलब्ध होने लगीं।
इससे ज्योतिष का प्रचार-प्रसार वैश्विक स्तर पर हुआ। आज अमेरिका से लेकर जापान तक लोग वैदिक ज्योतिष की सटीकता को स्वीकार करते हैं।
ज्योतिष के विकास का सरलीकृत चार्ट
| कालखंड | मुख्य विशेषता | प्रमुख ग्रंथ/ऋषि |
| वैदिक काल | नक्षत्र आधारित, यज्ञ समय निर्धारण | ऋग्वेद, यजुर्वेद |
| वेदांग काल | खगोलीय गणनाओं का प्रारंभ | लगध मुनि (वेदांग ज्योतिष) |
| सिद्धांत काल | राशि चक्र, होरा शास्त्र, गणितीय सटीकता | आर्यभट्ट, वराहमिहिर, पराशर |
| मध्य काल | वर्षफल, ताजिक पद्धति | ताजिक नीलकंठी |
| आधुनिक काल | के.पी. पद्धति, कम्प्यूटर ज्योतिष | के.एस. कृष्णमूर्ति, बी.वी. रमन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: भारतीय ज्योतिष और पश्चिमी ज्योतिष में क्या अंतर है?
उत्तर: भारतीय (वैदिक) ज्योतिष 'नक्षत्र' और 'चंद्रमा' की स्थिति पर आधारित है, जिसे 'निरयन पद्धति' कहते हैं। यह खगोलीय रूप से अधिक सटीक है। पश्चिमी ज्योतिष 'सूर्य' और 'ऋतुओं' पर आधारित है (सायन पद्धति)।
प्रश्न 2: ज्योतिष के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?
उत्तर: ज्योतिष के 18 प्रवर्तक माने जाते हैं, जिनमें सूर्य, पितामह, नारद और पराशर प्रमुख हैं। कलयुग में महर्षि पराशर को फलित ज्योतिष का पितामह माना जाता है।
प्रश्न 3: क्या ज्योतिष एक विज्ञान है?
उत्तर: ज्योतिष के तीन भाग हैं। इसका 'गणित स्कंध' (खगोल विज्ञान) पूरी तरह से विज्ञान है जो ग्रहों की सटीक स्थिति बताता है। इसका 'फलित' भाग संभावनाओं और सांख्यिकी (Statistics) पर आधारित शास्त्र है।
प्रश्न 4: वेदांग ज्योतिष की रचना किसने की थी?
उत्तर: वेदांग ज्योतिष की रचना 'लगध मुनि' ने लगभग 1400 ईसा पूर्व में की थी। यह ज्योतिष का प्रथम उपलब्ध ग्रंथ है।
प्रश्न 5: क्या आधुनिक तकनीक ने ज्योतिष को प्रभावित किया है?
उत्तर: हाँ, संगणक (कम्प्यूटर) के आने से कुंडली निर्माण में होने वाली मानवीय भूलें समाप्त हो गई हैं और गणनाएं अत्यंत सटीक हो गई हैं, जिससे भविष्यवाणियों में सुधार हुआ है।
निष्कर्ष
ज्योतिष का 5000 वर्षों का यह विकास क्रम मानव की बौद्धिक यात्रा का प्रमाण है। यह अंधविश्वास के अंधेरे से नहीं, बल्कि अन्वेषण (Discovery) की रोशनी से उपजा है। वैदिक ऋषियों ने जिस ज्ञान को अपनी दिव्य दृष्टि से देखा था, उसे बाद के विद्वानों ने गणित की कसौटी पर कसा और आज तकनीक ने उसे सुलभ बना दिया है।
ज्योतिष का मूल उद्देश्य न कल बदला था, न आज बदला है। यह उद्देश्य है— मानव को समय (काल) के प्रवाह के साथ सामंजस्य बिठाना और जीवन की अनिश्चितताओं में मार्ग दिखाना। यह एक ऐसी धरोहर है जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए।