भद्रा क्या है और क्यों मचता है बवाल?
मेरे दादाजी हमेशा कहते थे, "भद्रा का नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं जैसे कोई राक्षस आ गया हो।" सच तो यह है कि भद्रा पंचांग का एक विशेष करण है जिसे विष्टि करण भी कहते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि भद्रा काल में शुभ कार्य वर्जित होते हैं। लेकिन एक बात समझना ज़रूरी है - भद्रा तीन लोकों में भटकती है।
जब भद्रा पाताल लोक में प्रवेश करती है, तब पृथ्वी पर इसका प्रभाव कम हो जाता है। जब स्वर्ग लोक में जाती है, तो बिल्कुल नगण्य रहता है। यही कारण है कि पंडितजी पंचांग देखकर बताते हैं, "भद्रा रात 8 बजे के बाद पाताल में चली गई, अब होलिका दहन कर लो।"
सबसे बड़ा भ्रम: लोग सोचते हैं भद्रा का मतलब होलिका दहन रद्द। लेकिन शास्त्र कहते हैं - भद्रा समाप्ति के बाद का समय श्रेष्ठ है।
ग्रहण का डर - कितना जायज़?
ग्रहण को राहु-केतु की छाया माना जाता है। उस समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। लेकिन एक बात याद रखें - ग्रहण के दौरान नई पूजा शुरू नहीं करते, जो पहले से चल रही हो उसे रोक भी नहीं सकते।
होलिका दहन की लकड़ी चढ़ाने का कार्य ग्रहण से पहले पूरा हो जाता है। आग प्रज्वलित करने का क्षण ही मुख्य है। अगर ग्रहण रात को समाप्त हो जाए, तो स्नान-शुद्धि के बाद दहन हो सकता है। मेरे एक पंडित मित्र ने बताया, "ग्रहण के बाद किया गया होलिका दहन स्वयं राहु-केतु की नकारात्मकता को जलाता है।"
2026 में कैसा है योग?
मान लीजिए फाल्गुन पूर्णिमा पर भद्रा सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक है। ग्रहण रात 11 बजे समाप्त हो रहा है। तो क्रम इस तरह होगा:
सुबह: होलिका संकल्प + लकड़ी चढ़ाना (भद्रा से पहले)
दोपहर: भद्रा काल - चुपचाप प्रार्थना
रात 8 बजे बाद: भद्रा मुक्त समय में अग्नि प्रज्वलन
ग्रहण समाप्ति: शुद्धि स्नान + मुख्य दहन
मुख्य बात: होलिका दहन पूर्णिमा तिथि से जुड़ा है, न कि केवल घड़ी के कांटों से।
शास्त्रों का स्पष्ट मत
धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथ कहते हैं:
"भद्रा रहित प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि पर होलिका दहन श्रेष्ठ। यदि भद्रा रात्रि में समाप्त हो तो तत्पश्चात् दहन विधान।"
मतलब: रात का समय भद्रा मुक्त हो तो बिना संकोच दहन करें। ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
मेरे गाँव का अनुभव
पिछले साल हमारे गाँव में भी यही विवाद हुआ था। आधे लोग कह रहे थे "भद्रा है, न करें"। आधे कह रहे थे "परंपरा तो निभानी है"। अंत में पंडितजी ने पंचांग दिखाया - भद्रा रात 9:30 बजे पाताल चली गई। रात 10 बजे होलिका प्रज्ज्वलित हुई। अगले दिन होली के रंग और भी खिले हुए थे।
व्यावहारिक उपाय - बिना भ्रम के दहन करें
सुबह की तैयारी (भद्रा से पहले):
होलिका का संकल्प लें 2. सूखी लकड़ी, गोबर उपले चढ़ाएं 3. नारियल फोड़कर प्राण प्रतिष्ठा करें
भद्रा काल में:
मौन रहें, मानसिक प्रार्थना करें 2. होलिका की परिक्रमा न करें 3. नकारात्मक चर्चा से दूर रहें
भद्रा समाप्ति के बाद:
पंचांग से समय की पुष्टि करें 2. अग्नि प्रज्वलन का संकल्प लें 3. "होलिकायै नमः" बोलकर दहन करें
होलिका दहन के 5 स्वर्ण नियम
स्थान: उत्तर-पूर्व दिशा में होलिका बनी हो
मुख: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर करें
वस्त्र: स्वच्छ पीले/नारंगी वस्त्र
प्रसाद: गुड़, चने, नारियल वितरण
भाव: अधर्म का नाश, धर्म की जय का संकल्प
आध्यात्मिक संदेश जो बदल देगा नज़रिया
होलिका दहन केवल आग जलाना नहीं है। यह आंतरिक भद्रा (क्रोध, लोभ, अहंकार) को जलाने का संदेश है। बाहरी भद्रा-ग्रहण तो समय के साथ आते-जाते रहेंगे। असली परीक्षा तो धैर्य और विवेक की है।
जैसे भक्त प्रह्लाद ने होलिका की आग में भगवान का नाम लिया, वैसे ही हम भी नकारात्मक परिस्थितियों में सकारात्मक भाव रखें। यही सच्चा होलिका दहन है।
सामान्य भ्रांतियां जो दूर कर लें
"भद्रा है तो दहन मत करो" - गलत। भद्रा मुक्त समय देखें।
"ग्रहण में सब बंद" - गलत। पहले से चली परंपरा जारी रखें।
"शहरों में न करें" - गलत। गाँव-शहर सबमें परंपरा।
सही: पंचांग देखें, भाव शुद्ध रखें, सामूहिक दहन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भद्रा में होलिका दहन हो सकता है?
नहीं, लेकिन भद्रा समाप्ति के बाद का समय श्रेष्ठ है।
ग्रहण के बाद दहन शुभ है?
हाँ, स्नान-शुद्धि के बाद पूर्णतः शुभ।
रात 12 बजे के बाद दहन ठीक है?
हाँ, प्रदोष काल में भद्रा मुक्त हो तो।
घर पर छोटी होलिका जला सकते हैं?
हाँ, गोबर उपले से प्रतीकात्मक दहन।
बच्चों को परिक्रमा कराएं?
हाँ, सकारात्मक संकल्प के साथ।
अंतिम बात
भद्रा हो या ग्रहण, होलिका दहन पूर्णिमा का पर्व है। समय का इंतज़ार करें, शास्त्रों का पालन करें, और सबसे बड़ी बात - सकारात्मक भाव रखें। होलिका की आग न केवल बाहरी अंधकार जलाएगी, बल्कि आपके भीतर के भय को भी भस्म कर देगी।
होलिका दहन का मूल मंत्र: "जो समय का सम्मान करता है, वही परंपरा का रक्षक है।"
