होलिका दहन मुहूर्त 2026: इस समय भूलकर भी न करें पूजा, जानें सही समय और नियम
सनातन हिंदू धर्म में फाल्गुन मास की पूर्णिमा का अत्यंत विशिष्ट और आध्यात्मिक महत्व है। इसी पावन तिथि की संध्या पर 'होलिका दहन' का महापर्व पूर्ण हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व केवल लकड़ियों के ढेर को प्रज्वलित करने का कृत्य नहीं है, अपितु यह हमारे भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को ज्ञान और भक्ति की अग्नि में भस्म कर आत्म-शुद्धि करने का एक दिव्य अवसर है।
वर्ष 2026 में होलिका दहन का यह पर्व ज्योतिषीय और खगोलीय दृष्टिकोण से अत्यंत रहस्यमय और असाधारण संयोग लेकर आ रहा है। इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा के दिन 'भद्रा काल' और 'खग्रास चंद्र ग्रहण' का साया एक साथ उपस्थित हो रहा है, जिसके कारण होलिका दहन के शुभ मुहूर्त और पूजन के समय को लेकर जनमानस में भारी असमंजस और भ्रांति की स्थिति उत्पन्न हो गई है। स्किल एस्ट्रो के इस विशेष और विस्तृत लेख में, हम वैदिक पंचांग की सूक्ष्म और प्रामाणिक गणनाओं के आधार पर आपके सभी संशयों का निवारण करेंगे। यहाँ आप विस्तार से जानेंगे कि वह कौन सा अशुभ समय है जब भूलकर भी होलिका पूजन नहीं करना चाहिए, पूजा का सबसे सटीक मुहूर्त क्या है, और जीवन की हर बाधा को दूर करने वाले अचूक वैदिक नियम क्या हैं।
इस समय भूलकर भी न करें पूजा: निषिद्ध काल का रहस्य
शास्त्रों में किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य के लिए समय (मुहूर्त) शुद्धि को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई है। वर्ष 2026 में होलिका दहन के दिन दो प्रमुख बाधाएं उपस्थित हो रही हैं, जिनके समय काल में पूजा करना सर्वथा वर्जित और अनिष्टकारी माना गया है:
1. भद्रा मुख काल का अशुभ प्रभाव
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, भद्रा सूर्य देव की पुत्री और कर्मफल दाता शनि देव की बहन हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भयानक और स्वभाव अत्यंत क्रोधी तथा विनाशकारी माना गया है। पंचांग के पाँच अंगों में से एक 'विष्टि करण' को ही भद्रा कहा जाता है। शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है: "भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।" अर्थात् भद्रा काल में रक्षाबंधन (श्रावणी) और होलिका दहन (फाल्गुनी) भूलकर भी नहीं करना चाहिए। यदि कोई अज्ञानवश भद्रा मुख काल में होलिका दहन करता है, तो यह कृत्य उस व्यक्ति, उसके परिवार और संपूर्ण राष्ट्र के लिए अत्यंत अमंगलकारी सिद्ध होता है। वर्ष 2026 में 3 मार्च को प्रातः 02:46 से 04:43 तक 'भद्रा मुख' का समय रहेगा, जिसे पूर्ण रूप से त्यागना अनिवार्य है।
2. चंद्र ग्रहण और सूतक काल का निषेध
वर्ष 2026 में 3 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ही खग्रास चंद्र ग्रहण भी लग रहा है। वैदिक नियमों और धर्मसिंधु के अनुसार, चंद्र ग्रहण लगने से ठीक नौ घंटे पूर्व 'सूतक काल' प्रारंभ हो जाता है। सूतक काल और ग्रहण की अवधि के दौरान किसी भी देवी-देवता की मूर्ति का स्पर्श करना, कोई भी नया मांगलिक कार्य प्रारंभ करना, या होलिका का पूजन और दहन करना पूर्णतः निषिद्ध है। ग्रहण के समय नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव सर्वाधिक होता है। अतः सूतक काल से लेकर ग्रहण के मोक्ष (समाप्ति) तक केवल मानसिक मंत्र जाप ही करना चाहिए। 3 मार्च 2026 को सायं 06:47 बजे चंद्र ग्रहण समाप्त होगा, और इसके पश्चात ही होलिका दहन की प्रक्रिया आरंभ की जा सकेगी।
होलिका दहन 2026: सटीक पंचांग और सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (तालिका)
किसी भी मांगलिक कार्य में मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। पंचांग की शुद्ध गणना के अनुसार वर्ष 2026 में होलिका दहन का संपूर्ण विवरण इस प्रकार है:
(ध्यान दें: 3 मार्च को सायं 06:47 बजे चंद्र ग्रहण पूर्ण रूप से समाप्त हो रहा है। इसके उपरांत स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने के पश्चात ही होलिका दहन का पवित्र अनुष्ठान किया जाना चाहिए।)
होलिका दहन के अनिवार्य और शास्त्रोक्त नियम
होलिका दहन मात्र लकड़ियों का ढेर जलाना नहीं है, अपितु यह अग्नि देव की साक्षात और प्रत्यक्ष उपासना है। इस पावन अवसर पर निम्नलिखित वैदिक नियमों का पालन करना अत्यंत अनिवार्य है:
स्नान और शारीरिक शुद्धि: चंद्र ग्रहण समाप्त होने के तुरंत बाद स्नान करना अनिवार्य है। जल में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करने से ग्रहण काल की सभी नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त हो जाती हैं।
दिशा का ज्ञान: होलिका पूजन के समय उपासक का मुख सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। यह दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा और कुबेर देव का वास मानी जाती हैं।
गर्भवती महिलाओं के लिए नियम: गर्भवती स्त्रियों को होलिका दहन की अग्नि के बहुत समीप नहीं जाना चाहिए और न ही परिक्रमा करनी चाहिए। उन्हें घर के भीतर रहकर मानसिक रूप से भगवान श्री नरसिंह का स्मरण करना चाहिए।
नवजात शिशु संबंधी नियम: जिन घरों में नवजात शिशु हों, उन्हें भी होलिका दहन वाले स्थान पर नहीं ले जाना चाहिए, क्योंकि यह अग्नि उग्र होती है और इस दिन वातावरण में अनेक प्रकार की तंत्र ऊर्जाएं भी सक्रिय रहती हैं।
अग्नि में आहुति का विधान: होलिका की अग्नि में नवधान्य (नौ प्रकार के अनाज), सरसों के दाने, सूखी लौंग और नई फसल (गेहूं या जौ की बालियां) की आहुति देना परम आवश्यक है। यह अग्नि देव को नवसंवत्सर की फसल का प्रथम भोग होता है।
स्किल एस्ट्रो विशेष: चिकित्सा ज्योतिष के अनुसार स्वास्थ्यवर्धक उपाय
सनातन धर्म की हर परंपरा के पीछे गहरा विज्ञान और आयुर्वेद छिपा है। चिकित्सा ज्योतिष के सिद्धांतों के अनुसार, होलिका दहन की अग्नि और भस्म (राख) शरीर के त्रिदोषों (वात, पित्त और कफ) को संतुलित करने की अद्भुत क्षमता रखती है। यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य अस्वस्थ है, तो होलिका दहन पर ये विशेष उपाय अवश्य करें:
रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि: यदि शरीर में बार-बार संक्रमण होता है या लग्नेश कमजोर है, तो होलिका दहन की अग्नि में मुट्ठी भर पीली सरसों, कपूर और गिलोय की सूखी डंडियां अर्पित करें। इस अग्नि के धुएं के संपर्क में आने से वायुमंडल शुद्ध होता है और श्वास के माध्यम से शरीर में प्राण शक्ति का संचार होता है।
चर्म रोग और त्वचा संबंधी दोष: होलिका दहन के अगले दिन प्रातःकाल, होलिका की ठंडी और पवित्र भस्म (राख) को घर ले आएं। स्नान करने से पूर्व जल में चुटकी भर भस्म मिलाएं। चिकित्सा ज्योतिष के अनुसार ऐसा करने से त्वचा के रोग, एलर्जी और बुध ग्रह से संबंधित सभी विकार दूर होते हैं।
मानसिक तनाव और अवसाद से मुक्ति: चंद्र ग्रहण के प्रभाव और कमजोर चंद्रमा के कारण यदि कोई मानसिक अवसाद या अनिद्रा से पीड़ित है, तो होलिका की अग्नि की सात बार परिक्रमा करते हुए 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का मानसिक जाप करें। अग्नि का ताप शरीर के आज्ञा चक्र को जाग्रत कर मानसिक शांति प्रदान करता है।
होलिका दहन का पौराणिक आख्यान
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, दंभ और अहंकार से चूर असुरराज हिरण्यकशिपु ने स्वयं को तीनों लोकों का ईश्वर घोषित कर दिया था। परंतु उसका अपना ही पुत्र प्रह्लाद भगवान श्रीहरि विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र को मृत्युदंड देने के अनेक कुप्रयास किए। अंततः उसने अपनी बहन 'होलिका', जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था, को यह आदेश दिया कि वह बालक प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर प्रज्वलित चिता में बैठ जाए। परंतु नारायण की अद्भुत लीला के कारण वरदान प्राप्त होलिका उसी प्रचंड अग्नि में भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद पूर्णतः सुरक्षित और सकुशल बाहर आ गए। यह कथा प्रमाणित करती है कि ईश्वर के प्रति अटूट आस्था और समर्पण सदैव असत्य और अहंकार पर विजय प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: होलिका दहन 2026 में कब है और इसका सटीक मुहूर्त क्या है?
उत्तर: होलिका दहन 3 मार्च 2026 को किया जाएगा। चंद्र ग्रहण की समाप्ति के उपरांत सायं 06:47 बजे से लेकर रात्रि 08:50 बजे तक का समय दहन के लिए सर्वश्रेष्ठ और निर्दोष है।
प्रश्न 2: क्या सूतक काल में होलिका दहन की तैयारी की जा सकती है?
उत्तर: सूतक काल में किसी भी प्रकार की पूजा की तैयारी या सामग्रियों को स्पर्श करना वर्जित होता है। ग्रहण समाप्ति (सायं 06:47) के पश्चात स्नान करके ही सभी सामग्रियां एकत्रित कर पूजन आरंभ करना चाहिए।
प्रश्न 3: नवविवाहित वधुओं को होलिका दहन क्यों नहीं देखना चाहिए?
उत्तर: कुछ क्षेत्रीय मान्यताओं और ज्योतिषीय मतों के अनुसार, विवाह के पहले वर्ष नवविवाहित वधुओं को होलिका की जलती हुई अग्नि को साक्षात देखने से मना किया जाता है, क्योंकि इसे शुभ नहीं माना जाता। वह घर के भीतर रहकर भगवान का स्मरण कर सकती हैं।
प्रश्न 4: होलिका की अग्नि में जौ की बालियां क्यों सेंकी जाती हैं?
उत्तर: फाल्गुन मास में नई फसल तैयार होती है। अग्नि में नई बालियों को सेंककर अग्नि देव को प्रथम भोग लगाया जाता है। इन सिकी हुई बालियों को घर लाकर तिजोरी या अन्न के भंडार में रखने से घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।
निष्कर्ष
होलिका दहन का यह पावन पर्व हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा देता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, सत्य और ईश्वर के प्रति हमारा विश्वास कभी डिगना नहीं चाहिए। वर्ष 2026 में भद्रा काल और खग्रास चंद्र ग्रहण के इस दुर्लभ और संवेदनशील खगोलीय संयोग के बीच, यदि हम पंचांग द्वारा निर्धारित शास्त्रोक्त मुहूर्त (3 मार्च सायं 06:47 के पश्चात) पर पूर्ण श्रद्धा और शुद्धता के साथ अग्नि देव की उपासना करें, तो निश्चित रूप से हमारे जीवन के सभी कष्ट और नकारात्मक ऊर्जाएं जलकर भस्म हो जाएंगी।
